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    मध्य प्रदेश

    दतिया उपचुनाव: हार की सतही समीक्षा से गहरे संकट का इलाज कैसे होगा?

    Ranjan SrivastavaBy Ranjan SrivastavaAugust 6, 2026No Comments6 Mins Read
    BJP defeat in Madhya Pradesh's Datia state assembly seat by-poll
    BJP candidate for Datia state assembly seat Ashutosh Tiwari during his campaign. Polling was held on July 30, 2026. Pic: Ashutosh Tiwari's Twitter Account

    भोपाल: दतिया विधान सभा उपचुनाव में भाजपा की हार के बाद पार्टी के प्रदेश नेतृत्व ने इसकी जिम्मेदारी पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के दरवाजे पर डाल दी है. इसके साथ ही दतिया जिला संगठन को भी भंग कर दिया गया. लेकिन क्या इस कार्रवाई से उस राजनीतिक बीमारी का इलाज हो जाएगा, जिसकी झलक दतिया से पहले विजयपुर के उपचुनाव में भी दिखाई दे चुकी है?

    यह स्क्रिप्ट तो पहले से ही तय थी. अगर भाजपा जीत जाती तो यह जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में सत्ता और संगठन की जीत होती और हारने पर यही होना था जो हो रहा है.

    दरअसल, इस हार की समीक्षा के लिए जिस तरह आनन–फ़ानन में दो पदाधिकारियों की टीम बनाई गई जिनमें कोई भी बड़ा नाम नहीं था उसी से स्पष्ट था कि भाजपा का प्रदेश नेतृत्व किस तरह की समीक्षा चाहता है.

    जिला कार्यकारिणी भंग करने में इतनी जल्दी क्यों?

    उपचुनाव का परिणाम सोमवार को आया. मंगलवार को यह टीम बनाई गई और इस टीम ने ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों को भी मात देते हुए इतनी तेजी से काम किया कि कुछ ही घंटों में, रात होते–होते पार्टी ने इस टीम की रिपोर्ट के आधार पर दतिया जिले में अपने पूरे संगठन को ही भंग कर दिया.

    दरअसल, दतिया उपचुनाव का परिणाम आने के बाद इस तेजी और सतही समीक्षा के पीछे भाजपा के प्रदेश नेतृत्व और सरकार में वह बेचैनी है कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की नजर में इस हार के लिए सरकार और पार्टी नेतृत्व दोनों को जिम्मेदार मानने से बचाया जाय.

    दतिया के पहले विजयपुर की हार

    भाजपा नेतृत्व में बेचैनी के पीछे सिर्फ दतिया की हार नहीं है, बल्कि इससे पहले विजयपुर की भी हार है.

    वर्ष 2023 में संपन्न हुए विधान सभा चुनावों के बाद दतिया सहित 3 विधान सभा सीटों के लिए उपचुनाव हुए हैं उनमें सिर्फ बुधनी सीट ही पार्टी जीत पायी है.

    आम तौर पर ऐसा देखा गया है कि उपचुनावों में जो पार्टी सत्ता में रहती है, वही जीतती है, अगर कोई बहुत बड़ा उलटफेर नहीं हुआ हो तो.

    अगर किसी कार्यकर्ता या नेता या उनके किसी समूह के स्तर पर चुनाव में भितरघात हुआ है या उनके द्वारा निष्क्रियता बरती गयी है तो पार्टी में अनुशासन को स्थापित करने के लिए ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए.

    क्या संगठन भंग करना ही समीक्षा है?

    पर सवाल यह है कि क्या भाजपा इस हार की तह में जाकर उन फैसलों और परिस्थितियों की भी समीक्षा करेगी जिनके कारण सत्ता में होने के बावजूद पार्टी को लगातार उपचुनावों में झटके लग रहे हैं.

    अगर पार्टी मानती है कि दतिया में  नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं देने के कारण हुए पार्टी में असंतोष ने चुनाव परिणाम को प्रभावित किया तो यह सवाल भी उठता है कि टिकट पर निर्णय लेने वालों की भूमिका की समीक्षा कौन करेगा?

    दतिया में जो हुआ उसे केवल “भितरघात” कहकर खत्म कर देना सबसे आसान रास्ता है. महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वह परिस्थिति पैदा ही क्यों हुई जिसमें पार्टी के अपने कार्यकर्ता और समर्थक अपने ही उम्मीदवार के खिलाफ खड़े दिखाई दिए.

    भाजपा के 20 हजार से ज्यादा वोट घटे

    यह भी ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस ने इस चुनाव में कोई असाधारण प्रदर्शन नहीं किया. उसके वोट 2023 के मुकाबले 22 हजार से ज्यादा घटे हैं. इसके बावजूद भाजपा 2023 के मुकाबले 20 हजार से ज्यादा वोट खोकर चुनाव हार गई.

    यानी दतिया की कहानी सिर्फ कांग्रेस की जीत की नहीं, बल्कि भाजपा के अपने वोटों के खिसकने की भी है. और यही इस हार को महज “ये सीट कांग्रेस की ही थी” जैसे बयान देकर ख़ारिज करने के बजाय भाजपा के लिए गंभीर राजनीतिक संकेत बनाता है.

    अगर मत प्रतिशत भी देखा जाए तो कांग्रेस को 2023 में मिले 50.34% वोट की जगह इस बार सिर्फ 42.39% वोट मिले यानी कांग्रेस के लगभग 8% वोट कम हुए. पर भाजपा के भी 7% से ज्यादा वोट कम हो गए 2023 के मुकाबले.

    यही वह बिंदु है जहां सतही समीक्षा और वास्तविक समीक्षा के बीच फर्क साफ दिखाई देता है.

    आजाद समाज पार्टी से हुआ नुक़सान

    भाजपा की रणनीति में शायद यह उम्मीद रही होगी कि आजाद समाज पार्टी इस उपचुनाव में कांग्रेस का वोट काटेगी और भाजपा प्रत्याशी की जीत आसान हो जाएगी. लेकिन हुआ इसके उलट. आज़ाद समाज पार्टी के प्रत्याशी दामोदर यादव ने 22527 (14.3%) वोट पाकर सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि भाजपा के भी वोट भी काट डाले जिनमें ओबीसी वोटर्स भी थे.

    साथ ही, भाजपा को यह भी सोचना होगा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की गेम चेंजर योजना लाड़ली बहना के जारी रहने के बावजूद महिला मतदाता बड़ी संख्या में भाजपा के पक्ष में क्यों नहीं आईं. 2023 के विधानसभा चुनाव में इसी योजना को भाजपा की बड़ी जीत के महत्वपूर्ण कारणों में गिना गया था.

    क्या समीक्षा का दायरा बढ़ेगा?

    अगर भाजपा यह जानना चाहती है कि सत्ता में रहते हुए उसके अपने मतदाता उससे क्यों दूर हुए, तो समीक्षा का दायरा दतिया जिला संगठन से बहुत आगे बढ़ाना होगा.

    क्या भाजपा अपनी उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया की भी समीक्षा करेगी? स्थानीय संगठन से प्रत्याशी चयन में रायशुमारी कितनी प्रभावी थी?

    क्या प्रदेश इकाई से लेकर विधानसभा स्तर तक संगठन की वह मशीनरी समय रहते कार्यकर्ताओं के असंतोष और नाराजगी को पढ़ने में विफल रही, जिसका काम ही ऐसे संकेतों को पहचानना और उन्हें दूर करना है?

    क्या सरकार की खुफिया एजेंसियां भी यह आकलन करने में विफल रहीं कि टिकट बदलने के बाद दतिया में जमीन पर क्या प्रतिक्रिया हो रही है?

    एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या पार्टी इस हार को केवल संगठनात्मक अनुशासन का मामला मानेगी या इसे राजनीतिक चेतावनी के रूप में भी देखेगी?

    क्योंकि दतिया अकेला मामला नहीं है. बुधनी में भाजपा जीत तो गई, लेकिन उसका जीत का अंतर लगभग 91 हजार घटकर करीब 13 हजार रह गया था जबकि यह सीट केंद्रीय कृषि मंत्री तथा पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पारम्परिक सीट रही है. विजयपुर में भाजपा उम्मीदवार रामनिवास रावत सरकार में मंत्री रहते हुए भी कांग्रेस के उम्मीदवार मुकेश मल्होत्रा से हार गए थे. अब दतिया में पार्टी को 6,016 वोट से हार मिली है.

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    Ranjan Srivastava

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