भोपाल: मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए मंत्रि-परिषद ने रविवार को UCC विधेयक के ड्राफ्ट को मंजूरी दे दी. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया. सरकार मानसून सत्र में विधेयक को विधानसभा में पेश कर सकती है.
मंत्रि-परिषद की बैठक जगदीशपुर के चमन महल में रविवार (19 जुलाई, 2026) को आयोजित की गई. बैठक के लिए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और उनके मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री और राज्य मंत्री एक इलेक्ट्रिक बस में सवार होकर तथा मुख्य सचिव और अन्य सम्बंधित अधिकारी दूसरे इलेक्ट्रिक बस में सवार होकर मीटिंग स्थल पर पहुंचे.
विधानसभा के मानसून सत्र की बैठक सोमवार (20 जुलाई, 2026) से आयोजित की जा रही है.

उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जहां समान नागरिक संहिता सबसे पहले लागू की गई.
मध्य प्रदेश सरकार के अनुसार यह विधेयक उत्तराखंड (2024), गुजरात (2026) और असम (2026) के यूनिफॉर्म सिविल कोड के गहन अध्ययन के बाद तैयार किया गया है.
अगर यह विधेयक विधानसभा में पारित होने के बाद कानून बनता है तो इसके प्रावधानों के अनुसार बहुविवाह पर रोक लगेगी और तलाक के बाद उसी जीवनसाथी से दोबारा शादी करने के लिए “निकाह हलाला” जैसी प्रथा कानूनी अपराध मानी जाएगी.
बहुविवाह का तात्पर्य यह है कि किसी भी समुदाय में कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही जीवित जीवनसाथी के साथ शादीशुदा रह सकता है.
किन पर लागू नहीं होगा UCC?
हालांकि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुच्छेद 366 (खंड 25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों (जैसे भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया) पर लागू नहीं होगा. इसके अलावा, जिन समुदायों के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा संविधान के भाग XXI के तहत की गई है, उन्हें भी इस कोड से विशेष रूप से बाहर रखा गया है.
लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship) में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य और ये होंगे नियम
लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास “लिव-इन रिलेशनशिप का बयान” जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा.
पार्टनर्स की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए. वे प्रतिबंधित श्रेणी में न हों, पहले से विवाहित न हों और उनकी सहमति स्वतंत्र होनी चाहिए.
यदि कोई पार्टनर 21 साल से कम उम्र का है, तो लिव-इन के शुरू होने और खत्म होने की जानकारी उनके माता-पिता या अभिभावकों को भेजी जाएगी. रजिस्ट्रार यह रिकॉर्ड स्थानीय पुलिस स्टेशन को भी भेजेगा.
क्या होंगे Live-in पार्टनर और बच्चों के अधिकार?
लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा और उन्हें पूर्ण उत्तराधिकार मिलेगा.
यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो वह सक्षम अदालत के माध्यम से कानूनी पत्नी की तरह ही भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) का दावा कर सकेगी.
बिना रजिस्ट्रेशन एक महीने से ज्यादा साथ रहने पर 3 महीने तक की जेल या 10,000 रुपये जुर्माने का प्रावधान है.
गलत जानकारी देने पर 3 महीने की जेल और 25,000 रुपये जुर्माना तथा रजिस्ट्रार के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर 6 महीने तक की जेल और 25,000 रुपये के जुर्माने का प्रावधान है.
क्या है विवाह की आयु और शर्तें?
ड्राफ्ट में दिए गए प्रावधानों के अनुसार विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष तय की गई है. ऐसे महिला और पुरुष जिनके बीच सहमति अमान्य है और जो प्रतिबंधित रिश्तों के अंतर्गत आते हों (जब तक परंपरा इसकी अनुमति न देती हो), उनके बीच विवाह पर रोक लगाई गई है.
क्या होगा तलाक़ का आधार?
मौखिक तलाक या अनौपचारिक पंचायत के फैसलों को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित किया गया है. अब विवाह का समापन केवल कानून में बताए गए स्पष्ट और वैधानिक आधारों पर ही हो सकता है.
गर्भावस्था के आधार पर क्या होगा पत्नी का अधिकार?
मौजूदा व्यवस्था के विपरीत, अब महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है कि यदि उनके पति ने शादी के समय किसी दूसरी महिला को गर्भवती किया है, तो पत्नी शादी को रद्द घोषित करने की मांग कर सकती है.
शादी और तलाक का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, पर कब होगा जुर्माना?
शादी और तलाक दोनों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है.
शहरी क्षेत्रों में “एमपी ई-नगर पालिका पोर्टल” और ग्रामीण क्षेत्रों में एसडीएम, नगरपालिका या पंचायत के जरिए यह प्रक्रिया पूरी होगी.
रजिस्ट्रेशन न होने से शादी अमान्य नहीं होगी, लेकिन रजिस्ट्रार द्वारा बिना ठोस लिखित कारण के आवेदन खारिज करने पर जुर्माने का प्रावधान है.
क्या होंगे बच्चों के अधिकार और कस्टडी के नियम?
संहिता के कानून बनने की स्थिति में कानूनी ढांचे से “अवैध” (इलिजिटिमेट) शब्द को पूरी तरह हटा दिया जाएगा.
विवाहित या अविवाहित माता-पिता के बच्चों, जैविक, गोद लिए गए, सरोगेसी या असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) से पैदा हुए सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा प्राप्त होगा.
बच्चे का हित सर्वोपरि
कस्टडी से जुड़े किसी भी विवाद में माता-पिता के अधिकारों के मुकाबले “बच्चे का हित और सर्वांगीण भलाई” ही अदालत के फैसले का मुख्य और अनिवार्य आधार होगी.
उत्तराधिकार का एक समान और जेंडर-न्यूट्रल ढांचा
बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए जाएंगे, चाहे उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो. मृतक की संपत्ति में विधवाओं और विधुरों के साथ भी समान व्यवहार होगा.
माता-पिता का समान दर्जा
जीवित माता और पिता दोनों को क्लास-1 का उत्तराधिकारी माना गया है और वे मृतक बच्चे की संपत्ति में जीवनसाथी और बच्चों के साथ बराबर का हिस्सा पाएंगे.
क्या होगा उत्तराधिकार का क्रम?
बिना वसीयत मरे व्यक्ति की संपत्ति को तीन वर्गों (क्लास-1, क्लास-2 और अन्य रिश्तेदार) में क्रमिक तरीके (ग्रैजुअल स्कीम) से बांटा जाएगा. पिछली पीढ़ियों के लिए एक “यूनिट सिस्टम” और “सर्वाइवरशिप का अधिकार” लागू किया जाएगा.
अयोग्यता और एस्चीट (Escheat)
यदि कोई व्यक्ति संपत्ति के मालिक की हत्या या उसमें मदद का दोषी है, तो वह विरासत से हमेशा के लिए अयोग्य हो जाएगा. यदि किसी का कोई कानूनी वारिस नहीं है, तो “एस्चीट” सिद्धांत के तहत संपत्ति राज्य को हस्तांतरित हो जाएगी.
वसीयत (Will) नियमों में क्या हुए बदलाव?
एक नई धर्मनिरपेक्ष प्रणाली के तहत अब कोई भी स्वस्थ मस्तिष्क का वयस्क अपनी 100 प्रतिशत संपत्ति (स्वयं अर्जित और पैतृक दोनों) वसीयत के माध्यम से किसी को भी दे सकता है. इससे पुरानी “अनिवार्य उत्तराधिकार” की सीमाएं (जैसे इस्लामी कानून में एक-तिहाई की सीमा) समाप्त हो जाएंगी. यह प्रक्रिया “भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925” के तहत संचालित होगी.
एक नजर में
- बहुविवाह पर रोक.
- निकाह हलाला दंडनीय अपराध.
- विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण.
- बेटा-बेटी को समान उत्तराधिकार.
- लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य.
- अनुसूचित जनजातियां कानून के दायरे से बाहर.
- विधानसभा के मानसून सत्र में विधेयक पेश होने की संभावना.

